शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

 चले थे हम दोनो साथ साथ 

आया एक अकेला सा चौराहा

धीरे से छूटा उसका हाथ

मैं उससे मुड़ते हुए देखता रहा


किसीने उससे वक्त कहा

किसीने कहा वो दोस्त है

किसीने कहा वो बदल गया

कोई बोला मौका परस्त है


मुट्ठी की जोर से  बंद मैने 

दिल पर रख दिया पत्थर

आंसू को बहने दिया मैंने

मुस्कुराहट को न हटने दिया मगर


मंजिल पर निशाना बनी नजर

अर्थ समझा मछली की आंख का

अंतरात्मा को जिंदा रखा मगर

चोला पहन लिया आखरी राख का

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