बचपन से एक सीख पड़ी कानो में
तेज़ है भागना तो भागो अकेले
दूर की मंजिल हो सपनो में
तो साथ चलो हाथ डाले हाथों में
सब बोलते यह बोल
पर सुनता ना खुदको ही कोई
हर जगह बजता यह ढोल
घोड़े बेच के पर सोया हर कोई
आगे दौड़े, भागे सबसे तेज़
दिखी ना सामने अंधेरी खाई
कभी आखरी पड़ाव पर गिरे
कभी पहले कदम पर ठोकर खाई
वक्त है अभी भी थोड़ा बचा
समझ इस कहानी की गहराई
लंबी मंजिल पर नज़र टिका
जीत रहेगी बनके तेरी परछाई

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