कण कण मे स्वर की हार
जीत के पहले आखरी सांस
मजिंल के आखरी पडाव पर
टूटती हौसले की आस
वक्त की अंगुलियों के बीच से
फिसलती हुई उम्मीद की डोर
चांद ग्रहण का फैला अंधेरा
ना फूटती सूर्य की भोर
हारते मन की सिसक
नम आखों की मुस्कान
खुशियों मे जश्न की चमक
गम मे जैसे सूना श्मशान

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