बडा बेरहम चल रहा वक्त
हाथ बाधं के ललचाए मन
जब आया समय कछ करने का
तब उम्मीद पर चढा कफन
देख के अपने बचपन की परछाई
उसको पकड़ने को निस्सहाय
उसकी हठ जब हद पर आए
अमर्ष की सीमा पार हो जाए
माॅ के थकते चहरे को देख
पापा की हर कोशिश को करके महसूस
मजबूरी के भार से होती दफन
म्लानि बिन्दु पहुंचता मेरा तमस

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