चले दो दोस्त मंजिल की ओर
हंसते गाते कटते थे पल
आया बीच रास्ते एक छोर
दाए मुड़ा एक दूसरा बांए दिया चल
एक ना थामा शांति को
चला भीड़ के संग संग
मूक बंधु बना हर गलती को
सही गलत से रहा वो मलंग
दूसरे रहा सदैव उत्तेजित
रहा संघर्ष में अकेला खड़ा
जो बात उसे लगी अनुचित
बेहिचक वो उसके विरुद्ध रहा अड़ा
चलते चलते बहुत दूर हुए
आंखों से हुए दोनो ओझल
अपनी अपनी राह लिए
दोनो तलाशते रहे उनकी मंजिल
