बांटते बांटते खुशियां हर जगह
खुद खुश रहना भूल गई
रास्ता दिखाते दिखाते औरों को
खुद का ही कहीं भटक गई
छांटते छांटते अंधेरा सबका
खुद की रोशनी ही बुझ गई
समेटते समेटते हर रिश्ते को
मैं खुद ही बिखर सी गई
जिताते जिताते सबको
कब हार अपनी हो गई
जवाब देते देते सबको
खुद एक सवाल बन के रह गई

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